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आपसे हर सप्ताह संवाद करना मेरे लिए केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि अलवर की साझा विकास यात्रा पर संवाद का एक माध्यम है। इसी क्रम में आज भी मन में बहुत-सी बातें हैं, अलवर के विकास, हमारे क्षेत्र की प्रगति और आने वाले समय की संभावनाओं को लेकर। इस समय निकाय चुनावों की आदर्श आचार संहिता प्रभावी है, इसलिए इस पाती में मैं किसी नए विकास कार्य, स्वीकृति अथवा सरकारी उपलब्धियों की जानकारी साझा नहीं कर पाऊँगा।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्वाचन की निष्पक्षता सर्वोपरि है और आदर्श आचार संहिता का पालन हम सभी की जिम्मेदारी है।
विकास के विषय पर चर्चा न कर पाना, अलवर के प्रति मेरे संकल्प और संवाद को रोक नहीं सकता। चुनाव के बाद आदर्श आचार संहिता समाप्त होने पर मैं दोबारा अलवर लोकसभा क्षेत्र को और अधिक समृद्ध, सक्षम और सुंदर बनाने की दिशा में लागू की जा रही योजनाओं को आपके साथ साझा करूँगा।
मैंने आपके साथ मिलकर अलवर में कई सामाजिक और सांस्कृतिक विषयों को आगे बढ़ाने का प्रयास किया है। पिछले दिनों ई-गुरुकुल के मित्रों, डेयरी से जुड़े पशुपालकों, स्वयं सहायता समूहों की बहनों, किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) से जुड़े भाइयों तथा अलवर लोकसभा क्षेत्र के इन्फ्लुएंसर्स से संवाद का अवसर मिला। इन सभी के साथ हुए संवाद में कई महत्वपूर्ण विषय सामने आए। आने वाली पातियों में मैं आपसे इन विषयों पर अपने विचार और अनुभव साझा करूँगा।
आज यह पाती आपको अलवर से 5,000 किलोमीटर से भी ज्यादा दूर, मंगोलिया की राजधानी उलान बातार से लिख रहा हूँ। मैं यहाँ United Nations Convention to Combat Desertification की COP17 में भारत का प्रतिनिधित्व करने आया हूँ। इस COP, यानी Conference of Parties, में लगभग 197 देश भाग ले रहे हैं।
भारत यहाँ इन 197 देशों के साथ desertification, यानी मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखे की आपस में जुड़ी चुनौतियों के समाधान के एकजुट होकर विचार-विमर्श कर रहा है। साथ ही, यह स्वीकार करेंगे कि भूमि का पुनर्स्थापन अस्थिरता को कम करने, विस्थापन को रोकने तथा संवेदनशील क्षेत्रों में मानव और राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ करने के लिए भी अत्यंत आवश्यक है।
पृथ्वी की कुल सतह का लगभग 29% हिस्सा भूमि है, जबकि करीब 71% हिस्सा महासागर और जल से ढका है। भूमि निम्नीकरण कोई नगण्य घटना नहीं है; इसका खाद्य उत्पादन, जल उपलब्धता, आजीविका और आर्थिक स्थिरता पर दूरगामी प्रभाव पड़ता है।
आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि इस 29% का लगभग 40% हिस्सा भूमि निम्नीकरण, या land degradation, का शिकार है।
मंगोलिया मंगोल साम्राज्य की ऐतिहासिक जन्मभूमि रहा है, जो मानव इतिहास का सबसे बड़ा सन्निहित भू-साम्राज्य था। 1206 में चंगेज़ खान ने इसकी स्थापना कर विभिन्न घुमंतू जनजातियों को एकजुट किया। इसके पश्चात ‘पैक्स मंगोलिका’ का एक ऐसा दौर आया, जिसने यूरेशिया में सिल्क रोड के माध्यम से वैश्विक व्यापार, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और यात्राओं की सुरक्षा को अभूतपूर्व गति प्रदान की।
लेकिन आज मंगोलिया की लगभग 77 प्रतिशत भूमि मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण की गंभीर चुनौती का सामना कर रही है। विशेष रूप से मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखे की चुनौतियों से जूझते मंगोलिया का अनुभव दुनिया के लिए महत्वपूर्ण सीख प्रस्तुत करता है कि भूमि का संरक्षण केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि खाद्य, जल, आजीविका और राष्ट्रीय सुरक्षा का भी प्रश्न है।
भूमि निम्नीकरण का चरवाहा और पशुपालक समुदायों (pastoral communities) पर गहरा प्रभाव पड़ता है। पोषक चारे की कमी से पशुओं का स्वास्थ्य, दूध उत्पादन और प्रजनन क्षमता प्रभावित होती है। सूखते तालाब, कुएँ और अन्य जलस्रोत पशुओं तथा समुदाय दोनों के लिए संकट बढ़ाते हैं। चरागाह और पानी की तलाश में पशुपालकों को अधिक दूर तक जाना पड़ता है, जिससे पारंपरिक चराई मार्ग और जीवनशैली प्रभावित होती है। चारा खरीदने, पशुओं को दूर ले जाने और पानी की व्यवस्था करने की लागत बढ़ती है, जबकि पशुधन से होने वाली आय घट सकती है। इसका दूरगामी प्रभाव कृषि उत्पादकता पर भी पड़ता है।
भारत मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखे से निपटने के लिए बहुआयामी रणनीति पर काम कर रहा है। भारत ने 2030 तक 26 million hectares degraded land को restore करने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए भूमि उपचार, वनीकरण, जल संरक्षण और पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली पर काम हो रहा है। हम 'Catch the Rain', अमृत सरोवर, watershed development और वर्षा जल संचयन जैसे अभियानों के माध्यम से वर्षाजल को संरक्षित कर भूजल और जल उपलब्धता को मजबूत किया जा रहा है।
बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण, agroforestry और degraded land पर हरित आवरण विकसित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। भारत Land Degradation Neutrality (LDN) के लक्ष्य की दिशा में काम कर रहा है। इसका सीधा मतलब है कि जितनी भूमि degraded हो, कम-से-कम उतनी ही भूमि को पुनर्स्थापित किया जाए। ISRO की satellite-based monitoring और GIS तकनीक के माध्यम से भूमि क्षरण और मरुस्थलीकरण की स्थिति का आकलन और निगरानी की जा रही है। Soil Health Card, sustainable agriculture, micro-irrigation और प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर प्रबंधन के माध्यम से मिट्टी की गुणवत्ता और कृषि उत्पादकता को बनाए रखने पर जोर है। Aravalli Green Wall Project के माध्यम से अरावली पर्वतमाला के आसपास के क्षेत्रों में degraded land को restore करने, हरित आवरण बढ़ाने और मरुस्थलीकरण को रोकने का प्रयास किया जा रहा है।
आप यह कह सकते हैं भारत के लिए भूमि संरक्षण केवल पर्यावरण का विषय नहीं है; यह अन्न, जल, आजीविका और आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा का संकल्प है।
मंगोलिया में मैं भारत की इन्हीं उपलब्धियों को दुनिया के सामने रखूँगा। हमारा उद्देश्य मात्र अपनी उपलब्धियां गिनाना नहीं है। आज विश्व समझ चुका है दुनिया के किसी भी हिस्से में गरीबी का होना, हर जगह की समृद्धि के लिए खतरा है। इसलिए हम एकजुट होकर इन जटिल समस्याओं का हल ढूंढ रहे हैं। हमारा उद्देश्य है हम अपनी उपलब्धियां से सीखे गए अनुभव दुनिया के साथ साझा कर सकें, साथ ही उनके अनुभवों से कुछ सीख सकें।
अगली पाती में मैं आपसे इस COP के निष्कर्षों और कई अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर अपने विचार साझा करूँगा। उससे पहले, इस सप्ताह देश रक्षाबंधन का पावन पर्व मनाएगा। अलवर लोकसभा क्षेत्र की मेरी सभी बहनों को इस पावन अवसर पर हार्दिक अग्रिम शुभकामनाएँ।
आपका अपना
भूपेंद्र यादव